ईरान के साथ जंग में ट्रंप ने किस वजह से लिया चर्चिल का नाम और ब्रिटेन-स्पेन से क्यों हैं नाराज़

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अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की विदेश नीति अक्सर अपने विरोधियों से टकराव के कारण सुर्खियों में रहती रही है.
लेकिन इस बार विवाद उन देशों के साथ सामने आया है जिन्हें लंबे समय से अमेरिका का सबसे भरोसेमंद सहयोगी माना जाता है. ये देश हैं ब्रिटेन, स्पेन और कनाडा.
अमेरिका-इसराइल के ईरान के साथ युद्ध को लेकर बढ़ते तनाव के बीच इन तीनों देशों के अमेरिका के साथ रिश्तों में खटास के संकेत साफ़ दिख रहे हैं.
ट्रंप ने सार्वजनिक तौर पर इन देशों के नेताओं की आलोचना की है, कुछ मामलों में कड़े बयान दिए हैं और यहां तक संकेत दिया है कि वह आर्थिक या कूटनीतिक क़दम उठा सकते हैं.
लेकिन सवाल यह है कि आख़िर ऐसा क्या हुआ कि अमेरिका और उसके पारंपरिक सहयोगियों के बीच इस तरह का तनाव पैदा हो गया.
इस विवाद को समझने के लिए हाल के दिनों की घटनाओं को थोड़ा पीछे जाकर देखना होगा.
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ईरान पर हमलों के बाद बढ़ा तनाव

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अमेरिका और इसराइल की ओर से ईरान के ख़िलाफ़ शुरू किए गए युद्ध ने पश्चिमी देशों के बीच भी अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ पैदा कीं.
कुछ देशों ने इस कार्रवाई का समर्थन किया, जबकि कई यूरोपीय देशों ने सावधानी भरा रुख़ अपनाया.
इसी संदर्भ में स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ का बयान ख़ासा चर्चा में आया.
उन्होंने अमेरिका और इसराइल की सैन्य कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि यह क़दम क्षेत्र को और अस्थिर कर सकता है.
उन्होंने युद्ध के ख़िलाफ़ अपनी स्थिति दोहराते हुए कहा कि स्पेन ऐसी कार्रवाई का समर्थन नहीं करता जो संघर्ष को और बढ़ा सकती है.
बुधवार को टीवी पर दिए एक भाषण में स्पेन के प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज़ ने कहा है कि स्पेन की सरकार की स्थिति को इन शब्दों से समझा जा सकता है- “नो टू वॉर” यानी ‘युद्ध नहीं’.
2003 में इराक़ पर किए गए हमले का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि इतिहास में की गई ग़लतियों को दोहराया नहीं जाना चाहिए. सांचेज़ ने कहा कि उस युद्ध ने अपने लक्ष्य हासिल नहीं किए, असुरक्षा पैदा की और कई लोगों के जीवन को बर्बाद कर दिया.
उन्होंने कहा कि ईरान पर किए गए हमले का आर्थिक असर भी दसियों लाख के लिए वैसा ही हो सकता है.
ईरान युद्ध को लेकर स्पेन का यह रुख़ अमेरिका को पसंद नहीं आया. मंगलवार को ही राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पेन के साथ सभी संबंध ख़त्म करने की धमकी दी थी.
इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने स्पेन को लेकर तीखी प्रतिक्रिया दी और यहां तक कहा कि अमेरिका स्पेन के साथ व्यापारिक संबंधों पर पुनर्विचार कर सकता है.
स्पेन के इस रुख़ के बाद ट्रंप ने स्पेन को “अच्छा सहयोगी नहीं” बताया और कहा कि अमेरिका उन देशों के साथ अपने रिश्तों को अलग तरीके से देख सकता है जो उसके साथ खड़े नहीं होते.
स्पेन के सैन्य अड्डों का मुद्दा
स्पेन के साथ विवाद का एक अहम पहलू सैन्य सहयोग से जुड़ा है.
दरअसल, स्पेन ने ईरान के ख़िलाफ़ युद्ध में अपने सैन्य अड्डे के इस्तेमाल से इनकार कर दिया है.
दक्षिणी स्पेन में रोता और मोरोन जैसे सैन्य अड्डे लंबे समय से अमेरिका और नेटो के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण रहे हैं.
इन अड्डों का इस्तेमाल भूमध्यसागर और मध्य-पूर्व में होने वाले अभियानों के लिए किया जाता रहा है.
लेकिन ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई के संदर्भ में स्पेन ने अपने रुख़ को लेकर सावधानी दिखाई.
स्पेन की सरकार का कहना है कि अंतरराष्ट्रीय संकटों में सैन्य कार्रवाई के बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए.
स्पेन का यह रुख़ यूरोप के भीतर भी एक व्यापक बहस को दर्शाता है कि मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव का जवाब सैन्य कार्रवाई से दिया जाए या कूटनीतिक रास्ते से.
ब्रिटेन के साथ बयानबाज़ी

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ब्रिटेन को अक्सर अमेरिका का सबसे क़रीबी सहयोगी कहा जाता है.
द्वितीय विश्व युद्ध से लेकर इराक़ और अफ़ग़ानिस्तान तक कई बड़े सैन्य अभियानों में दोनों देशों ने साथ काम किया है.
2003 में इराक़ पर आक्रमण के दौरान ब्रिटेन ने हिस्सा लिया था और ब्रितानी सैनिक ज़मीनी कार्रवाइयों में भी शामिल थे.
लेकिन इस बार ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीएर स्टार्मर ने एक ऐसा बयान दिया जिसने अमेरिका में नाराज़गी पैदा कर दी.
स्टार्मर ने कहा कि उनका देश किसी दूसरे देश में “सैन्य बल के ज़रिए शासन परिवर्तन” का समर्थन नहीं करता.
यह टिप्पणी उस बहस के बीच आई जब यह सवाल उठ रहा था कि क्या ईरान के ख़िलाफ़ सैन्य कार्रवाई का उद्देश्य केवल ईरान की तरफ़ से संभावित हमलों को रोकना है या उससे आगे जाकर राजनीतिक बदलाव लाना भी है.
अमेरिका-इसराइल के ईरान के साथ युद्ध का बुधवार को पांचवां दिन है लेकिन अभी तक इसराइल और अमेरिका ने इस युद्ध को लेकर अपने लक्ष्य स्पष्ट नहीं किए हैं.
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ब्रितानी प्रधानमंत्री के इस बयान की आलोचना की और कहा कि अमेरिका को ऐसे समय में अपने सहयोगियों से स्पष्ट समर्थन की उम्मीद होती है.
हालांकि ब्रिटेन ने यह भी कहा कि वह क्षेत्र में तनाव कम करने की कोशिशों का समर्थन करता है और अपने नागरिकों की सुरक्षा के लिए क़दम उठा रहा है.
ब्रितानी प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति के बयानों ने ब्रिटेन और अमेरिका के ख़ास रिश्ते को भी सवालों में ला दिया है.
ब्रिटेन ने ईरान पर शुरुआती हमलों के लिए अमेरिका और इसराइल को अपने सैन्य अड्डे के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी थी.
हालांकि, बाद में ब्रिटेन ने ईरान के मिसाइल ठिकानों पर रक्षात्मक हमलों के लिए डिएगो गार्सिया और चागोस द्वीप स्थित ब्रितानी सैन्य अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति दे दी.
ओवल ऑफ़िस में पत्रकारों से बात करते हुए ट्रंप ने कहा कि वो ब्रिटेन के सैन्य अड्डों का इस्तेमाल ना करने देने के फ़ैसले से नाख़ुश हैं क्योंकि इसकी वजह से अमेरिकी विमानों को अधिक घंटों की उड़ान भरनी पड़ी.
ट्रंप की नाख़ुशी पर स्टार्मर ने कहा, “ये तय करना मेरी ज़िम्मेदारी है कि ब्रिटेन के राष्ट्रीय हित में क्या है.”
इसी संदर्भ में कीएर स्टार्मर पर टिप्पणी करते हुए ट्रंप ने कहा है, “स्टार्मर कोई विंस्टन चर्चिल नहीं हैं.”
विंस्टन चर्चिल दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे और उन्हें एक मज़बूत वैश्विक नेता के तौर पर देखा जाता है.
ब्रिटेन और अमेरिका के बीच ख़ास रिश्ते का ज़िक्र सबसे पहले तत्कालीन ब्रितानी प्रधानमंत्री विंसटन चर्चिल ने 80 साल पहले दूसरे विश्व युद्ध के दौरान किया था.
ब्रिटेन और अमेरिका के रिश्तों को लंबे समय से “स्पेशल रिलेशनशिप” कहा जाता है.
इस शब्द का इस्तेमाल उस घनिष्ठ साझेदारी के लिए किया जाता है जिसमें सैन्य सहयोग, खुफिया जानकारी साझा करना और कूटनीतिक तालमेल शामिल है.
लेकिन हाल के घटनाक्रमों ने यह दिखाया है कि इन रिश्तों में भी मतभेद उभर सकते हैं, खासकर तब जब अंतरराष्ट्रीय संकटों को लेकर दृष्टिकोण अलग-अलग हों.
कनाडा के साथ अलग तरह का तनाव

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ब्रिटेन और स्पेन के साथ विवाद मुख्य रूप से विदेश नीति से जुड़ा है, लेकिन कनाडा के साथ मामला थोड़ा अलग है.
कनाडा अमेरिका के सबसे बड़े व्यापारिक साझेदारों में से एक है. दोनों देशों के बीच हर साल सैकड़ों अरब डॉलर का व्यापार होता है.
लेकिन हाल के सालों में व्यापार, रक्षा और विदेश नीति के कुछ मुद्दों पर दोनों देशों के बीच मतभेद बढ़े हैं.
जनवरी 2026 में कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने चीन के साथ ‘नई रणनीतिक साझेदारी’ की, जिसे ट्रंप ने अमेरिका के ख़िलाफ़ ‘ड्रॉप-ऑफ़ पोर्ट’ बनाने का प्रयास बताया.
ट्रंप ने धमकी दी कि अगर कनाडा ऐसा करता है तो सभी कनाडाई सामानों पर 100% टैरिफ़ लगाएंगे, जो अमेरिकी उपभोक्ताओं के लिए महंगे साबित होगा.
वहीं, कनाडा के कुछ नेताओं ने भी मध्य-पूर्व में बढ़ते तनाव को लेकर चिंता जताई है और क्षेत्र में संघर्ष बढ़ने के जोख़िम की ओर इशारा किया है.
कनाडा के प्रधानमंत्री मार्क कार्नी ने युद्ध में शामिल सभी पक्षों से हिंसा रोकने के क़दम उठाने की अपील की है.
उन्होंने कहा है कि वह ईरान पर हमलों का समर्थन तो करते हैं लेकिन ये रुख़ उन्होंने अफ़सोस के साथ अपनाया है.
ऑस्ट्रेलिया दौरे के दौरान पत्रकारों से बात करते हुए कार्नी ने संयुक्त राष्ट्र या सहयोगी देशों के साथ चर्चा किए बिना ईरान पर हमला करने को लेकर इसराइल और अमेरिका की आलोचना भी की.
अमेरिकी प्रशासन ने इन टिप्पणियों को लेकर असंतोष जताया है.
यूरोप और अमेरिका के बीच पुराना मतभेद

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हालांकि, ईरान को लेकर अमेरिका और यूरोपीय देशों के बीच यह मतभेद बिल्कुल नया नहीं है.
पिछले कई सालों में अमेरिका और यूरोप के बीच इस मुद्दे पर अलग-अलग दृष्टिकोण दिखाई देते रहे हैं.
यूरोप के कई देशों ने लंबे समय तक ईरान के साथ परमाणु समझौते को बचाए रखने की कोशिश की, जबकि अमेरिका ने उससे अलग रास्ता अपनाया.
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब किसी मुद्दे पर अमेरिका और यूरोपीय देशों का रुख़ अलग हो.
अतीत में भी इराक़ युद्ध, जलवायु परिवर्तन और व्यापारिक नीतियों जैसे मुद्दों पर कई बार ऐसे मतभेद सामने आए हैं.
लेकिन अधिकतर मामलों में कूटनीतिक बातचीत के ज़रिए समाधान भी निकल आया है.
राष्ट्रपति ट्रंप ने एक बार फिर अपनी शैली में सहयोगी देशों पर निशाना साधा है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि वह कोई ठोस क़दम उठाएंगे या नहीं.
फ़िलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ट्रंप अपने बयानों के बाद कोई ठोस क़दम उठाएंगे या नहीं.
लेकिन यह विवाद एक बड़े सवाल को सामने लाता है, क्या बदलती वैश्विक परिस्थितियों में अमेरिका और यूरोपीय देशों के रिश्तों का स्वरूप भी बदल रहा है?
ईरान संकट, यूरोप की कूटनीतिक प्राथमिकताएं और डोनाल्ड ट्रंप की आक्रामक बयानबाज़ी, इन सबने मिलकर अमेरिका और यूरोप के गठबंधन को एक नए मोड़ पर ज़रूर ला खड़ा किया है.
हालांकि, कुछ मुद्दों पर मतभेद का मतलब यह नहीं है कि संबंध बिलकुल ही ठंडे बस्ते में चले जाएं.
इतिहास इस बात का गवाह है. वियतनाम युद्ध में ब्रिटेन ने अमेरिकी दबाव के बावजूद सैनिक नहीं भेजे थे.
लेकिन राष्ट्रपति ट्रंप के दौर में चीज़ें बहुत तेज़ी से बदलती हैं. छह महीने पहले ही ब्रिटेन ने ट्रंप के साथ रिश्ते-सुधारने के लिए बहुत कुछ किया था. ट्रंप ब्रिटेन के दौरे पर आए थे और कीएर स्टार्मर ने ट्रंप के स्वागत में कोई कमी नहीं छोड़ी थी.
और अब, राष्ट्रपति ट्रंप ने स्टार्मर पर बेहद व्यक्तिगत टिप्पणी की है. इससे अमेरिका और ब्रिटेन के रिश्तों में तनाव ज़ाहिर हुआ है.
ईरान पर हमलों के बाद ब्रिटेन में किए गए यूगोव के एक पोल से पता चला है कि ब्रितानी इससे नाख़ुश हैं. वहीं स्पेन में सीआईएस रिसर्च इंस्टीट्यूट के एक पोल से पता चला है कि स्पेन के 77 फ़ीसदी लोगों की ट्रंप के बारे में राय या तो ख़राब है या बहुत ख़राब है.
समाजवादी नेता पेद्रो सांचेज़ ईरान के मुद्दे पर सीधे-सीधे ट्रंप के ख़िलाफ़ खड़े हो गए हैं.
हालांकि, स्पेन के लोग इस बात को लेकर असमंजस में हैं कि ट्रंप की धमकी क्या वास्तविक कार्रवाई में बदलेगी.
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