महिलाओं में शराब-सिगरेट की लत कितनी बढ़ रही है?

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    • Author, रवि प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

पटना की रहने वाली संजना (बदला हुआ नाम) महज 22 साल की हैं.

पेशे से इंजीनियर संजना कहती हैं, “पढ़ाई के दौरान मैं एक रिलेशनशिप में थी. उससे ब्रेकअप हुआ, तो मैं छोटी-छोटी बात पर भी रोने लगती थी. बहुत ग़ुस्सा आता था. पढ़ाई में मन नहीं लगता था."

"हर बात में कन्फ्यूजन होता थी. वह मेरी ज़िंदगी का सबसे लो फेज था. मैं दोस्तों की संगत में गांजा और शराब लेने लगी. फिर कैसे और कब इसकी लत लग गई, पता ही नहीं चला.”

संजना कहती हैं, “मैंने उससे पहले कभी शराब नहीं पी थी. न गांजा लिया था. लेकिन, सब कुछ जल्दी-जल्दी हुआ. जब भी तनाव होता, मैं गांजा या शराब ले लेती."

"फिर घरवालों से नज़रें बचाते हुए वापस लौटती और सो जाती. कई महीनों तक ऐसा ही चलता रहा. खाने-पीने का न तो ख़्याल रहता था और न ज़रूरत महसूस होती थी.”

संजना ने बताया, "जब मेरे मां-पिता को मेरे दोस्तों के ज़रिये इसका पता चला, तो उन्होंने मुझे समझाने की कोशिशें की."

"उन्होंने मेरी तकलीफ़ को समझा और मेरा इलाज कराया. मेरी काउंसलिंग की गई और फिर रिहैबिलिटेशन के लिए मेरा इलाज शुरू हुआ."

संजना कहती हैं, "कई महीनों के इलाज के बाद मैं नशे की लत से बाहर निकल सकी. अब मैं नौकरी के लिए पुणे जाने वाली हूं. यह मेरी ज़िंदगी का नया स्टार्ट है.”

संजना ऐसी अकेली युवती नहीं हैं. संजना जैसी सैकड़ों लड़कियां मिल जाएंगी, जो कभी भावनाओं में बहकर, तो कभी दोस्तों के दबाव में आकर किसी न किसी नशे का सेवन करने लगती हैं.

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इमेज कैप्शन, एडिक्शन सेंटर की डॉक्टर प्रतिभा.

क्या लगती है लत?

पटना के एक प्रमुख एंटी एडिक्शन सेंटर की डॉक्टर प्रतिभा कहती हैं कि ज्यादातर मामलों में लत अनजाने में लगती है. आपतो पता ही नहीं चलता कि आप किसी लत के शिकार हो रहे हैं.

डॉक्टर प्रतिभा बीबीसी से कहती हैं, “कई बार लोगों को लगता है कि सब कुछ उनके कंट्रोल में है. उनको लत नहीं लगेगी लेकिन वे तेज़ी से इसके चंगुल में पड़ जाते हैं. एक बार शराब पी या गांजा लिया. शौक शौक में लिया और सोचा कि छोड़ देंगे."

"फिर उसकी तलब लगने लगी और आपको उसकी लत लग जाती है. लेकिन, इससे बाहर आना भी बहुत मुश्किल नहीं है. अगर फैमिली का सपोर्ट रहे तो कुछ ही महीने की काउंसलिंग और इलाज में आप इन लतों से बाहर आ सकते हैं.”

किंग्स कॉलेज लंदन में प्रोफ़ेसर शैली मार्लव का दावा है कि पुरुषों के मुक़ाबले महिलाएं लत की चपेट की कहीं जल्दी आ जाती हैं.

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वह अपना उदाहरण देते हुए कहती हैं कि 25 साल की उम्र में उन्हें भी लत लग गई थी, जिसके बाद उन्हें थेरेपी लेनी पड़ी.

शैली मार्लव, जुआ और नशे की लत की शिकार महिलाओं की मदद करने की दिशा में काम कर रही हैं.

वो बताती हैं, "अगर महिलाओं को किसी तरह की लत लगती है तो उन्हें किसी प्रकार का कोई सहयोग नहीं मिलता. वे स्टिग्मा को सहती हैं."

भारत सरकार के सूचना प्रसारण मंत्रालय के द्वारा जारी एक आँकड़े के मुताबिक़, साल 2018 में 18 से 75 उम्र वर्ग के 15 करोड़ से अधिक लोगों को शराब की लत थी.

इसके अलावा लोग कई दूसरी लतों के भी शिकार थे. सरकार के इस आँकड़े से यह तो पता नहीं चलता कि इनमें महिलाओं की कितनी संख्या है, लेकिन ये आँकड़े चिंताजनक तो हैं ही.

भारत सरकार ऐसे लोगों के लिए ‘नशा मुक्त भारत अभियान’ चला रही है.

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क्या महिलाओं की झिझक टूटी है

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पटना की ही जानी-मानी मनोवैज्ञानिक डॉक्टर बिंदा सिंह का मानना है कि किसी भी तरह की लत को लेकर महिलाओं में आज भी उतनी जागरूकता नहीं है.

उनकी झिझक नहीं टूटी है और लत सिर्फ़ शराब, सिगरेट या गांजा का ही नहीं होती. सोशल मीडिया के इस्तेमाल की बढ़ती लत और ज़्यादा साफ़-सफ़ाई की लत भी महिलाओं की दिनचर्या और सेहत पर बुरा प्रभाव डाल रही है.

वे कहती हैं कि अभी मैं एक ऐसी महिला की काउंसलिंग कर रही हूं, जिन्हें घर को हर वक़्त साफ़ रखने की लत है.

जैसे ही उनके घर में कोई मेहमान आया, उसके जाते ही वे साफ़-सफाई में जुट जाती हैं. इससे परेशान होकर उनके पति उन्हें मेरे पास लेकर आए.

डॉक्टर बिंदा सिंह ने बीबीसी से कहा, “पटना, रांची, रायपुर, वाराणसी जैसे टीयर-टू शहरों में एडिक्शन की शिकायतें लेकर डॉक्टर के पास आने वाले पुरुषों और महिलाओं की संख्या में काफ़ी अंतर है. एक औसत के मुताबिक़ हर 10 मरीज़ों में से महिलाओं की संख्या सिर्फ़ एक है."

"हां, दिल्ली, मुंबई, लखनऊ, पुणे जैसे शहरों में यह औसत बढ़िया है. कोई भी वैसी आदत, जिस पर आपका कंट्रोल नहीं है, वह एडिक्शन है. इसके लिए डॉक्टरी सलाह लेनी चाहिए. जितनी जल्दी आप डॉक्टर पास पहुंचेंगी, आपकी रिकवरी उतनी ही जल्दी हो जाएगी. यह समझने की ज़रूरत है.”

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बड़े शहरों में क्या हैं हालात

मुंबई में महिलाओं के के एक एडिक्शन रिहैब सेंटर की डॉक्टर आशा लिमये कहती हैं कि महानगरों में महिलाएं छोटे शहरों के मुक़ाबले ज़्यादा जागरूक हैं. वे अपनी समस्याएं बताती हैं और इस कारण उनकी रिकवरी ज़्यादा अच्छी तरह हो पाती है.

रांची स्थित सेंट्रल इंस्टीट्यूट आफ साइकेट्री के ड्रग एडिक्शन सेंटर के डॉक्टर रोशन वी खनंडे कहते हैं कि लतों के शिकार युवाओं की संख्या छोटे शहरों में भी बढ़ रही है.

इनमें 18-28 आयुवर्ग की लड़कियों की संख्या अधिक है. इन्हें शराब, गांजा, ड्रग्स या इस जैसी दूसरी चीज़ें मसलन, डेंड्राइट, व्हाइटनर, नशीली गोलियों आदि की लत है.

वे कहते हैं, यह अच्छी बात है कि कम ही सही लेकिन लड़कियां भी एडिक्शन सेंटर में अपने इलाज के लिए आने लगी हैं.

हालांकि, अभी भी हर 15 मरीज़ों में से सिर्फ़ एक महिला होती है. उनके न आ पाने के पीछे सामाजिक टैबू बड़ी वजह है.

दोबारा भी पड़ जाती है लत

राँची के एक नशा विमुक्ति केंद्र की प्रमुख सिस्टर अन्ना बार्के कहती हैं कि कई बार लोगों की लत छूटने के बाद वे दोबारा उसके चंगुल में फँस जाते हैं.

खासकर शराब और सिगरेट के मामलों में. हमारे पास प्रायः ऐसे मामले आते हैं, जब हमें मरीज़ों की दोबारा काउंसिलिंग करनी पड़ती है. क्योंकि उन्होंने दोबारा नशा लेना शुरू कर दिया होता है.

कैसे बचें एडिक्शन से

  • किसी भी तरह की दिक़्क़त की हालत में परिवार या दोस्तों से अपनी समस्या साझा करें.
  • लत छोटी या बड़ी नहीं होती. किसी को 30 एमएल शराब से ही नशे की लत पड़ सकती है, तो कोई ज़्यादा शराब पीकर इसका शिकार हो सकता है.
  • समस्याओं का निदान बातचीत में खोजने से आप लत से बच सकती हैं.
  • इसके बाद भी अगर किसी तरह की लत लग गई, तो कुछ महीने के इलाज और काउंसिलिंग से इसे ठीक किया जा सकता है.

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