लॉर्ड डलहौज़ी, जिनकी रजवाड़ों को निगलने की नीति 1857 के विद्रोह का कारण बनी

लॉर्ड डलहौज़ी की तस्वीर

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, लॉर्ड डलहौज़ी जो 1848 से 1856 तक भारत के गवर्नर जनरल रहे
    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

अंग्रेज़ों के नज़रिए से देखा जाए तो सन 1848 में भारत के गवर्नर जनरल बने लॉर्ड डलहौज़ी ने तीन बड़े काम किए थे. पहला उन्होंने ब्रिटिश इंडिया की सीमाओं को बहुत बढ़ाया.

डलहौज़ी ने अपनी 'डॉक्ट्रीन ऑफ़ लैप्स' नीति के तहत कई रजवाड़ों को ब्रिटिश राज में छल और बल से शामिल करके एक बड़े एम्पायर की नींव रखी, लेकिन डलहौज़ी की शायद सबसे बड़ी उपलब्धि थी पूरे भारत में रेलवे, सड़कों, संचार माध्यमों और नहरों का जाल बिछाना.

डलहौज़ी के जीवनीकार विलियम विल्सन हंटर लिखते हैं, "भारत का गवर्नर जनरल बनने से पहले डलहौज़ी को तीन ज़िम्मेदारियां दी गई थीं, सीमा का विस्तार, भारत का एकीकरण और भारत के आर्थिक संसाधनों का दोहन."

"डलहौज़ी इन ज़िम्मेदारियों पर पूरी तरह से खरे उतरे लेकिन भारतीय लोगों की नज़र से देखा जाए तो डलहौज़ी की इन नीतियों ने ही उन्हें यहां के लोगों से दूर कर दिया."

जाने-माने इतिहासकार अमर फ़ारूक़ी अपनी किताब 'गवर्नर्स ऑफ़ एम्पायर' में लिखते हैं, "डलहौज़ी एक विवादास्पद गवर्नर जनरल साबित हुए. कई लोगों का मानना है कि डलहौज़ी के कामों ने ऐसे हालात पैदा कर दिए जिसका नतीजा 1857 में आज़ादी की पहली लड़ाई थी."

अमर फ़ारूक़ी कि किताब गवर्नर्स ऑफ़ एम्पायर का कवर पेज

इमेज स्रोत, ALEPH

भारत के सबसे युवा गवर्नर जनरल

डलहौज़ी को जब भारत का गवर्नर जनरल बनाया गया तो उनकी उम्र मात्र 35 वर्ष थी. डलहौज़ी का जन्म 22 अप्रैल, 1812 को हुआ था. वह भारत की ज़मीन पर क़दम रखने वाले सबसे युवा गवर्नर जनरल थे.

एल जे ट्रॉटर अपनी किताब 'लाइफ़ ऑफ़ मारक्विस ऑफ़ डलहौज़ी' में लिखते हैं, "जब क्लाइव बंगाल के सर्वेसर्वा बने तो उनकी उम्र सिर्फ़ 32 साल की थी. क्लाइव और डलहौज़ी में फ़र्क ये था कि डलहौज़ी को सीधे भारत के सर्वोच्च पद पर बैठाया गया था जबकि उन्हें भारत की कोई जानकारी या अनुभव नहीं था. उनको ऐसे समय भारत में नियुक्त किया गया था जब ब्रिटेन में उनका राजनीतिक करियर सफलता के रास्ते पर निकल चुका था."

इस नियुक्ति के लिए डलहौज़ी ने कोई पैरवी नहीं की थी. दरअसल, प्रधानमंत्री लॉर्ड जॉन रसेल ब्रिटेन के तेज़ी से बदलते हुए राजनीतिक परिदृश्य में नए गठबंधन की तलाश कर रहे थे. वह चाहते थे कि डलहौज़ी के दोस्त उनके समर्थन में सामने आ जाएं, इसलिए डलहौज़ी को वह पद उन्होंने दिया था. इससे पहले वह डलहौज़ी को अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का न्यौता दे चुके थे जिसे डलहौज़ी ने स्वीकार नहीं किया था.

डलहौज़ी स्कॉटलैंड के एक बहुत प्रतिष्ठित परिवार से आते थे. उनका महलनुमा घर डलहौज़ी कासल एडिनबरा से कुछ ही दूरी पर था. इसे आजकल शानदार होटल में बदल दिया गया है. उनके पिता सन 1808 में सेना में मेजर जनरल के पद पर काम कर रहे थे. सन 1828 मे उन्हें भारत में ब्रिटिश सेना का कमांडर-इन-चीफ़ बनाया गया था. दो वर्षों तक इस पद पर काम करने के बाद उन्होंने यह पद छोड़ दिया था.

स्कॉटलैंड में डलहौज़ी का घर, जो डलहौज़ी कासल के नाम से मशहूर था

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, स्कॉटलैंड में डलहौज़ी का घर, जो डलहौज़ी कासल के नाम से मशहूर था

पच्चीस हज़ार पाउंड वेतन पर नियुक्ति

वीडियो कैप्शन, ब्रिटिश राज का विस्तार करने वाले गवर्नर जनरल की कहानी- विवेचना
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

जब सन 1847 में गवर्नर जनरल हार्डिंग का कार्यकाल समाप्त हुआ तो ब्रितानी प्रधानमंत्री रसेल ने डलहौज़ी को इस पद पर भेजने की मंशा प्रकट की. उस समय ये माना गया कि डलहौज़ी को यह पद देकर रसेल शायद इस पद का स्तर गिरा रहे हैं क्योंकि तब तक डलहौज़ी को प्रशासन का कोई ख़ास अनुभव नहीं था.

डलहौज़ी ने इस शर्त पर भारत का गवर्नर जनरल बनना स्वीकार किया कि उनसे अपनी राजनीतिक प्रतिबद्धताएं बदलने के लिए नहीं कहा जाएगा. अगस्त, 1847 में रानी विक्टोरिया ने उनके नियुक्ति पत्र पर हस्ताक्षर किए.

अमर फ़ारूक़ी लिखते हैं, "डलहौज़ी को पूरा आभास था कि लंबे समय तक ब्रिटेन से अनुपस्थिति उनके राजनीतिक करियर पर असर डाल सकती थी. उनके गवर्नर जनरल पद स्वीकार करने के पीछे एक कारण उन्हें मिलने वाला 25 हज़ार पाउंड का वार्षिक वेतन भी था. उन्हें लगता था कि इससे उनके परिवार की सभी वित्तीय समस्याएं दूर हो जाएंगी."

12 जनवरी, 1848 को लॉर्ड डलहौज़ी अपनी पत्नी और अपने निजी सचिव कोर्टनी के साथ कलकत्ता बंदरगाह पर उतरे. नाटे क़द और तेज़ दिमाग़ के मालिक डलहौज़ी की निगाहें पैनी थीं.

विलियम विल्सन हंटर लिखते हैं, "गवर्नमेंट हाउस में रहने वाले इस छोटे क़द के शख़्स ने पहले उन लोगों के मन में भय पैदा किया, फिर विश्वास और आख़िर में ज़बरदस्त आदर. डलहौज़ी अपनी 35 की उम्र से भी कम उम्र के दिखते थे. उनका माथा चौड़ा था और उनकी आवाज़ स्पष्ट और सुरीली थी."

लॉर्ड डलहौज़ी का कलर पोट्रेट

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, लॉर्ड डलहौज़ी (1812-1860)

क़दमों के दूरगामी परिणाम

डलहौज़ी सुबह छह बजे उठते थे. छह से आठ बजे तक वह बिस्तर पर ही दफ़्तर का काम निपटाते थे. कैप्टेन ट्रौटर लिखते हैं, "आठ बजे वह नाश्ता करते थे. उसी दौरान वह डायनिंग टेबिल पर रखे भारतीय अख़बारों पर भी नज़र डालते थे. साढ़े नौ बजे वह अपनी मेज़ पर चले जाते थे और शाम शाढ़े पांच बजे तक उसे नहीं छोड़ते थे. यहां तक कि वह अपना दोपहर का खाना भी दफ़्तर की मेज़ पर खाते थे. वह आठ घंटे तक लगातार काम करते थे. वह कम खाते थे और कम ही शराब पीते थे. उन्हें बड़ी दावतों में शामिल होना पसंद नहीं था लेकिन उनकी दी हुई दावतें भव्य होती थीं."

डलहौज़ी के पूर्ववर्ती शासकों ने जहां अधिक से अधिक भूमि को मित्र भारतीय राजाओं को दे रखा था, डलहौज़ी ने इस नीति में आमूल परिवर्तन कर अधिक से अधिक भूमि को ब्रिटिश राज में शामिल करने का बीड़ा उठाया.

मारेक बेंस-जोंस अपनी किताब 'द वॉयसरॉएज़ ऑफ़ इंडिया' में लिखते हैं, "इस नीति के तहत जिस तरह मध्य भारत के कुछ रजवाड़ों और अवध को ब्रिटिश शासन में मिलाया गया उसने पूरे भारत की राजनीति में तहलका मचा दिया जिसके परिणाम डलहौज़ी के उत्तराधिकारियों को झेलने पड़े. मध्य भारत के रजवाड़ों से सत्ता छीनने का कारण उत्तराधिकारियों का न होना बताया गया जबकि अवध के नवाब को कुप्रशासन के आधार पर गद्दी से बेदख़ल किया गया. इससे दूसरे भारतीय राजाओं में यह डर बैठ गया कि अगला नंबर उनका हो सकता है."

द वॉयसराय ऑफ़ इंडिया का कवर पेज

इमेज स्रोत, Constable London

पंजाब का अधिग्रहण

भारत में अपना कार्यभार संभालने के एक वर्ष के अंदर ही डलहौज़ी ने पंजाब को ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल कर लिया. 13 जनवरी, 1849 को ईस्ट इंडिया कंपनी की सेना ने चिलियांवाला की लड़ाई में सिख सेना को हरा दिया. इसके बाद 21 फ़रवरी को गुजरात में हुई लड़ाई में भी उसकी जीत हुई.

जब डलहौज़ी के पास ख़बर पहुंची कि महाराजा रणजीत सिंह के बेटे दलीप सिंह ने अंग्रेज़ों के साथ एक संधि पर दस्तख़त कर दिए हैं तो उनकी ख़ुशी का ठिकाना नहीं रहा. अपने एक मित्र को डलहौज़ी ने पत्र में लिखा, "मैंने अब खरगोश को पकड़ लिया है. पांच साल के महाराजा ने हमारे साथ जो संधि की है उसके अनुसार कोहिनूर हीरा इंग्लैंड की महारानी को भेजा जाएगा. हमने लाहौर के किले पर ब्रिटिश झंडा फहरा दिया है और पंजाब का एक-एक इंच अब भारत में ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बन गया है."

इसी पत्र में उन्होंने ख़ुद अपनी तारीफ़ करते हुए लिखा, "यह रोज़-रोज़ नहीं होता है कि ब्रिटिश सरकार का एक अधिकारी 40 लाख लोगों की प्रजा को ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल कर ले और मुग़ल सम्राटों के ऐतिहासिक हीरे को अपनी रानी के सामने रख दे. मैंने ये कर दिखाया है. ये मत समझो कि मैं बिना वजह ख़ुशी मना रहा हूं."

जब महाराजा दलीप सिंह समझौते पर दस्तख़त कर रहे थे, डलहौज़ी ने उन्हें पंजाब से साढ़े छह सौ मील दूर फ़तहगढ़ किले में भेजने का फ़ैसला कर लिया था. यही नहीं उनको उनकी मां जिंदन कौर से अलग करके एक अंग्रेज़ दंपती के संरक्षण में भेज दिया गया था.

बाद में दलीप सिंह ने ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था और उन्हें इंग्लैंड भेज दिया गया था.

महाराजा रणजीत सिंह के 5 वर्षीय बेटे दलीप सिंह

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, महाराजा रणजीत सिंह के 5 वर्षीय बेटे दलीप सिंह

बर्मा पर कब्ज़ा

पंजाब के बाद डलहौज़ी ने अगली सफलता बर्मा में अर्जित की. अंग्रेज़ सेना ने अप्रैल, 1852 में बर्मा में रंगून पर हमला करके उस पर कब्ज़ा कर लिया. दो महीने बाद एक और महत्वपूर्ण शहर पेगू पर अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया. कौंगबौंग साम्राज्य से छीनी गई सारी भूमि को एक ब्रिटिश राज्य बना दिया गया और उसे लोअर बर्मा का नाम दिया गया.

बर्मा की लड़ाई के दौरान डलहौज़ी ने मानसून की ज़बरदस्त बारिश का सामना करते हुए अपनी सेना का मनोबल बढ़ाने के लिए कलकत्ता से बर्मा के लिए कूच किया. 30 साल बाद 1885 में उत्तरी बर्मा पर भी अंग्रेज़ों का कब्ज़ा हो गया.

कौंगबौंग राजघराने के अंतिम शासक को गिरफ़्तार कर भारत में रत्नागिरि भेज दिया गया जहां सन 1916 में उनकी मृत्यु हो गई. जब सतारा के आखिरी राजा की मृत्यु हुई तो कंपनी ने वहां का शासन अपने हाथ में ले लिया और राज परिवार को निर्वासन में भेज दिया.

पांच साल बाद झांसी मे भी यही स्थिति पैदा हुई जब राज गंगाधर राव की मृत्यु हो गई. उस समय उन की कोई संतान नहीं थी.

जॉन विल्सन अपनी किताब 'इंडिया कॉनकर्ड' में लिखते हैं, "झांसी के राजा गंगाधर राव की पत्नी रानी लक्ष्मीबाई को कंपनी ने 60 हज़ार रुपए की पेंशन दी लेकिन उन्हें अपने दत्तक बेटे के साथ पति के किले से हटा दिया. बाद में वह बहुत बड़ी विद्रोही नेता बनीं. उसी तरह आखिरी पेशवा के दत्तक पुत्र नाना साहब को कंपनी ने पेंशन देने से इनकार कर दिया. उन्होंने सन 1857 में कानपुर में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ विद्रोह का नेतृत्व किया."

महारानी लक्ष्मीबाई की हाथ में तलवार लिए फ़ोटो

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, महारानी लक्ष्मीबाई

अवध भी बना ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा

सन 1856 में डलहौज़ी का कार्यकाल समाप्त होने से कुछ समय पहले उन्होंने अवध को ब्रिटिश साम्राज्य में मिलाने का काम भी पूरा किया.

अमर फ़ारूक़ी लिखते हैं, "शुजाउद्दौला की मृत्यु के आठ साल बाद तक अवध पर अंग्रेज़ों का परोक्ष नियंत्रण था. इसकी स्वायत्तता करीब-करीब समाप्त हो चुकी थी. 18वीं सदी के अंत तक अवध में तैनात ईस्ट इंडिया कंपनी का रेज़िडेंट एक समानांतर शक्ति केंद्र के रूप में उभर चुका था. जब 1770 के दशक में अवध की राजधानी फ़ैज़ाबाद से लखनऊ लाई गई तो वहां नवाब के दरबार से शक्तिशाली ब्रिटिश रेज़िडेंट हो गया. डलहौज़ी ने नवाब की बची-खुची ताकत को भी समाप्त करने का फ़ैसला किया."

जनवरी, 1849 में वहां भेजे गए ब्रिटिश रेज़िडेंट स्लीमेन ने रिपोर्ट भेजी कि राज्य का प्रशासन पूरी तरह से ठप हो चुका है. सन 1855 मे ब्रिटिश कैबिनेट और ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशकों ने अवध को ब्रिटिश साम्राज्य का हिस्सा बनाने का फ़ैसला किया. फ़रवरी 1856 में अवध पर ईस्ट इंडिया कंपनी का कब्ज़ा हो गया और नवाब वाजिद अली शाह को निर्वासित कर कलकत्ता भेज दिया गया. यह काम पूरा होते ही डलहौज़ी ने अपना कार्यभार नवनियुक्त गवर्नर जनरल लॉर्ड कैनिंग को सौंप दिया.

लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह

इमेज स्रोत, Getty Images

इमेज कैप्शन, लखनऊ के नवाब वाजिद अली शाह

आक्रामक रणनीति

डलहौज़ी को सभी अंग्रेज़ गवर्नर जनरलों में सबसे आक्रामक गवर्नर जनरल माना जाता है. उन्होंने अपने कार्यकाल में करीब ढ़ाई लाख वर्ग मील इलाके को ब्रिटिश साम्राज्य में शामिल किया.

विलियम विल्सन हंटर ने लिखा था, "सन 1847 में भारत आते समय डलहौज़ी ने भारत के जिस नक्शे का अध्ययन किया था, उसमें और उस नक्शे में बहुत फ़र्क आ गया था जो उसने अपने उत्तराधिकारी को सौंपा था. इस बीच पंजाब, सिक्किम, कछार और बर्मा के एक भाग, सतारा और सिंध के एक हिस्से को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला लिया गया था. इसके अलावा, अवध, संबलपुर, जैतपुर, उदयपुर, झांसी, बरार और ख़ानदेश का एक हिस्सा भी उनकी झोली में आ गिरा था."

डलहौज़ी की विस्तारवादी कहकर आलोचना ज़रूर की जा सकती है लेकिन उन्हें भारत में सड़कों, रेलों, नहरों, जलमार्गों, टेलीग्राफ़, डाक व्यवस्था, शिक्षा और वाणिज्य के विस्तार का श्रेय भी दिया जाता है.

मार्क बेंस-जोंस लिखते हैं, "डलहौज़ी के समय में ही भारत में पहली रेल चली. डलहौज़ी ने भारत के लोगों को शिक्षा उपलब्ध कराई. सिंचाई व्यवस्था का विकास किया. भारत को डाक और टेलीग्राफ़ सेवाएं उपलब्ध कराईं लेकिन इन उपलब्धियों के बावजूद उन्हें वहां पसंद नहीं किया गया. उनके बारे में कहा गया कि वह हद से ज़्यादा निरंकुश और अक्खड़ थे. अपने मातहतों के प्रति उसका व्यवहार बहुत कठोर था. उसके तेज़ स्वभाव और गुस्से ने उन्हें उनके साथियों के बीच अलोकप्रिय बना दिया था. अपने कमांडर-इन-चीफ़ जनरल ह्यूज गॉफ़ और रॉबर्ट नेपियर से उसका झगड़ा हुआ था."

लॉर्ड डलहौज़ी

इमेज स्रोत, Constable London

इमेज कैप्शन, लॉर्ड डलहौज़ी

जीवन के अंतिम चार वर्ष गुमनामी में बीते

भारत से जाते-जाते डलहौज़ी के पैर की हड्डी में एक गंभीर बीमारी हो गई. जब उनके उत्तराधिकारी लॉर्ड कैनिंग कलकत्ता पहुंचे तो डलहौज़ी ने गवर्नर जनरल निवास पर बैसाखियों के सहारे खड़े होकर उनका स्वागत किया. 6 मार्च, 1856 को डलहौज़ी कलकत्ता से अपने देश के लिए रवाना हुए. वह इस बात से काफ़ी परेशान हुए कि देश वापसी की यात्रा पर उन्हें एक असुविधाजनक जहाज़ 'कैराडॉक' पर चढ़ाया गया.

उन्होंने काहिरा से अपने मित्र जॉर्ज कूपर को पत्र लिख कर सरकार की इस तंगदिली पर अपना रोष प्रकट किया कि उन्हें लेने के लिए 'कैराडॉक' जैसा पुराना जहाज़ भेजा गया. उन्होंने यह भी शिकायत की कि 'भारत से रवाना होने से पहले न तो मुझे ईस्ट इंडिया कंपनी के निदेशक मंडल ने और न ही महामहिम की सरकार ने शुक्रिया का एक शब्द भी कहा.'

कूपर डलहौज़ी के पिता के एडीसी हुआ करते थे और उनसे उम्र में 26 साल बड़े थे. लंदन पहुंच कर डलहौज़ी का मूड थोड़ा अच्छा हुआ जब उन्हें ये ख़बर मिली कि सरकार ने उन्हें पांच हज़ार पाउंड की वार्षिक पेंशन देने का फ़ैसला किया है. डलहौज़ी ने अपने जीवन के अंतिम चार वर्ष राजनीतिक गुमनामी में बिताए.

अमर फ़ारूकी लिखते हैं, "गवर्नर जनरल के तौर पर डलहौज़ी को भारत पर व्यवस्थित ढ़ंग से शासन करने का जुनून था. इस जुनून ने ही उन्हें बहुत बड़ा विस्तारवादी और हस्तक्षेप करने वाला शख़्स बना दिया था. डलहौज़ी को अपने काम में डूबने की भी आदत थी. भारत के प्रशासक के रूप में दिन में कई-कई घंटे काम करने से उनका शरीर थक गया था और शायद यही उनकी जल्दी मृत्यु का कारण बना."

दिसंबर 1860 में सिर्फ़ 48 साल की उम्र में डलहौज़ी की मृत्यु हो गई.

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, एक्स, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और व्हॉट्सऐप पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)