मध्य-पूर्व में जारी जंग से क्या भारत में बढ़ेंगे तेल के दाम या रूस से ज़रूरत पूरी हो जाएगी?
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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी के लिए
- पढ़ने का समय: 7 मिनट
अमेरिका-इसराइल और ईरान के बीच जारी युद्ध के दौरान होर्मुज़ स्ट्रेट के बंद होने की स्थिति में भारत की रूसी कच्चे तेल पर निर्भरता बढ़ने की संभावना है. होर्मुज़ स्ट्रेट से भारत अपनी 40 फ़ीसदी तेल आपूर्ति पूरी करता है.
एक समय भारत रूस से रोज़ाना 20 लाख बैरल तेल आयात कर रहा था, लेकिन इस साल जनवरी में आयात घटकर प्रतिदिन 11.6 लाख बैरल रह गया.
ऐसी उम्मीद जताई गई थी कि भारत अपने निर्यात पर 25 फ़ीसदी अमेरिकी टैरिफ़ दोबारा लगने से बचने के लिए और अमेरिका से 'समझौते के तहत किए वादे' को पूरा करने के लिए रूसी तेल आयात घटाएगा.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा था कि अगर भारत ने रूस से तेल आयात कम नहीं किया तो टैरिफ़ 18 फ़ीसदी से बढ़ाकर फिर 25 फ़ीसदी कर दिया जाएगा. उनका उद्देश्य यूक्रेन के ख़िलाफ़ युद्ध लड़ रहे रूस पर दबाव बढ़ाना था.
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हालांकि, भारत ने कहा था कि देश के 1.4 अरब लोगों की ऊर्जा ज़रूरतें और सुरक्षा उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता रहेगी.
भारत में तेल रिफ़ाइनरी कंपनियां रूसी तेल कई देशों को निर्यात करती रही हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि होर्मुज़ स्ट्रेट बंद होने से तेल आपूर्ति में कमी भारत को संकट में डाल सकती है.
ऊर्जा क्षेत्र में भारत के मध्य-पूर्व में जारी युद्ध के असर को झेलने की क्षमता का पता इस बात से चलेगा कि यह युद्ध कितने दिन तक चलता है.
ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ओआरएफ़) के चेयरमैन संजय जोशी ने बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहा, "हम ऊर्जा आपूर्ति की लाइनों को बंद नहीं कर सकते. जब तक आपूर्ति जारी है, तब तक ठीक है. लेकिन वैकल्पिक स्रोतों को भी देखना चाहिए. हमें सच में नहीं पता कि अगले कुछ हफ़्तों में क्या होगा, क्योंकि स्थिति बदलती रहती है."
लेकिन मौजूदा स्थिति में कारोबार करने का तरीक़ा बदल जाता है क्योंकि भारत के पास रिफ़ाइनरी की क्षमता बहुत ज़्यादा है.
जोशी ने कहा, "इसका मतलब यह है कि हमें कच्चे तेल की जितनी ज़रूरत है, उतनी ही अन्य देशों, जैसे यूरोप आदि को भी पेट्रोलियम उत्पादों की ज़रूरत है. यूक्रेन युद्ध के चरम पर यूरोपीय संघ और अमेरिका भी रूस से आयात किए गए कच्चे तेल से बने उत्पादों का इस्तेमाल कर रहे थे."
अगर भारत के रूस से तेल आपूर्ति बनाए रखने पर आपत्ति होती है तो क्या होगा?
जोशी ने कहा, "जो लोग आपत्ति कर रहे हैं, वे चाहें तो ख़ुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार सकते हैं."
इस बीच रूस ने तुरंत यह पेशकश की है कि "ऊर्जा आपूर्ति में लगातार बाधा आने पर वह भारत की ऊर्जा ज़रूरतों की मांग पूरी करेगा."
भारत क्यों संकट में आ सकता है?
भारत सरकार ने स्पष्ट कहा है कि युद्ध से सीधे तौर पर प्रभावित क्षेत्र में 'जारी स्थिति से निपटने के लिए' देश के पास पर्याप्त भंडार है.
विशेषज्ञों की राय भी सरकार के बयान से मिलती-जुलती है, हालांकि वे इसे कुछ अलग अंदाज़ में रखते हैं. सामान्य तौर पर उम्मीद जताई जा रही है कि मौजूदा जंग रूस-यूक्रेन जंग की तरह लंबी नहीं चलेगी.
ऑइलेक्स एक्सप्लोरेशन सप्लाइज़ के डायरेक्टर अर्जुन केंपानी बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, "भारत कुछ हद तक संकट में है. लेकिन अगर युद्ध अगले 15 दिनों में ख़त्म हो जाता है तो हम सहज स्थिति में रहेंगे. इससे आगे अगर युद्ध बढ़ता है तो हम संकट में आ सकते हैं और इसका असर अन्य वस्तुओं की क़ीमतों पर पड़ सकता है."
बिज़नेस एडवाइज़री फ़र्म ट्रांजैक्शन स्क्वेयर के संस्थापक गिरीश वानवरी ने भी कहा कि अगर युद्ध 15 दिन से ज़्यादा चला तो क़ीमतें बढ़ सकती हैं. उन्होंने कहा, "अगले तीन या चार दिन अहम हैं. अगर युद्ध और बढ़ता है तो यह समस्या बन जाएगा."
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74 दिनों का पर्याप्त भंडार: भारत सरकार
जनवरी में केंद्रीय पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने राज्यसभा में कहा था कि देश के पास आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में गुफाओं, रिफाइनरियों और भंडारण सुविधाओं में रखा इतना कच्चा तेल है कि वह घरेलू मांग को 74 दिनों तक पूरा कर सकता है.
समाचार एजेंसी एएनआई ने अधिकारियों के हवाले से बताया है कि कच्चे तेल का भंडार 25 दिन तक चल सकता है, जबकि पेट्रोल और डीज़ल जैसे पेट्रोलियम उत्पादों का भंडार अगले 25 दिन तक चल सकता है. यह शॉर्ट टर्म सप्लाई झटकों से निपटने के लिए रखे गए रणनीतिक भंडार से अलग है.
लेकिन प्राकृतिक गैस के सबसे बड़े आपूर्तिकर्ता क़तर ने एक ईरानी ड्रोन हमले के बाद अप्रत्याशित परिस्थितियों का हवाला देते हुए उत्पादन रोकने की बात कही है.
भारत के क़रीब 2.7 करोड़ टन लिक्विफ़ाइड नेचरल गैस (एलएनजी) की 40 फ़ीसदी आपूर्ति क़तर से होती है. गैस आयात करने वाली कंपनी पेट्रोनेट एलएनजी लिमिटेड ने भी अपने ग्राहकों, गेल इंडिया और इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन को आपूर्ति रुकने की जानकारी दी है.
केंद्रीय मंत्रालय ने अपनी प्रेस रिलीज़ में कहा, "भारत वैश्विक स्तर पर पेट्रोलियम उत्पादों का तीसरा सबसे बड़ा आयातक, चौथा सबसे बड़ा रिफाइनर और पांचवां सबसे बड़ा निर्यातक है. मध्य-पूर्व क्षेत्र से पैदा हुए अल्पकालिक व्यवधानों से निपटने के लिए देश के पास कच्चे तेल, पेट्रोल, डीज़ल और एविएशन टर्बाइन फ्यूल सहित प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों का पर्याप्त भंडार है."
बयान में कहा गया, "पिछले कुछ वर्षों में भारत ने ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाकर अपने लोगों के लिए किफ़ायती ऊर्जा की उपलब्धता सुनिश्चित की है. भारतीय ऊर्जा कंपनियों की अब ऐसी ऊर्जा आपूर्ति तक पहुंच है जो होर्मुज़ स्ट्रेट से होकर नहीं आती. ऐसे कार्गो उपलब्ध रहेंगे और होर्मुज़ के रास्ते अस्थायी रूप से प्रभावित आपूर्ति की भरपाई में मदद करेंगे."
क्या सरकार क़ीमतें बढ़ाएगी?
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नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ एडवांस्ड स्टडीज़ में ऊर्जा, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन के प्रोफ़ेसर आर श्रीकांत को तेल की क़ीमतें बढ़ने की उम्मीद नहीं है, क्योंकि तेल कंपनियों को कम दाम पर रूसी तेल मिलने के दौरान अतिरिक्त लाभ कमाने का मौक़ा मिला था.
वह बीबीसी न्यूज़ हिन्दी से कहते हैं, "तेल कंपनियों ने अच्छे समय में मुनाफ़ा कमाया है और अब इससे उनके मार्जिन पर असर नहीं पड़ना चाहिए. राजनीतिक तौर पर भी मुझे नहीं लगता कि सरकार उन्हें क़ीमतें बढ़ाने देगी."
प्रोफ़ेसर श्रीकांत ने कहा, "हम दो-तीन हफ़्तों तक स्थिति संभाल सकते हैं. लेकिन तेल को लेकर भारत से पहले कई अन्य देश परेशानी जताने लगेंगे. यह युद्ध मूल रूप से कई देशों को प्रभावित करेगा. किसी भी स्थिति में तेल की नाकेबंदी एक महीने से ज़्यादा नहीं चल सकती."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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