स्तनपान: वो ज़रूरी बातें जो हर नई माँ को ध्यान में रखनी चाहिए

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इमेज कैप्शन, एक से सात अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है.
    • Author, बालाजी विश्वनाथ
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता
  • पढ़ने का समय: 10 मिनट

एक से सात अगस्त तक विश्व स्तनपान सप्ताह मनाया जाता है.

ऐसे में वो कुछ महत्वपूर्ण चीजें क्या हैं, जिनका ख़्याल हर नई माँ को अपने शिशुओं को स्तनपान कराने के लिए ध्यान में रखना चाहिए.

जैसे एक नई माँ का क्या आहार होना चाहिए? किन आदतों को छोड़नाचाहिए? वो किस तरह की शारीरिक और मानसिक परेशानियों का सामना करती हैं?

विश्व स्तनपान सप्ताह के ख़ास मौक़े पर बीबीसी ने इन सब चीजों को समझने के लिए विशेषज्ञों से बात की.

स्तनपान के महत्व के बारे में स्त्री रोग विशेषज्ञ अमृता हरी कहती हैं, “जन्म के पहले दिन से लेकर छह महीने तक शिशुओं को जितने भी पोषक तत्वों की ज़रूरत होती है, वो सारे तत्व माँ के दूध में पाए जाते हैं. इसलिए इस अवधि में शिशुओं के लिए स्तनपान बेहद ज़रूरी है.”

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फिर छह महीने से लेकर 12 महीने तक की अवधि में शिशुओं के लिए ज़रूरी पोषक तत्वों में से आधे माँ के दूध से मिलते हैं.

यही वो समय होता है जब शिशुओं को सॉलिड फूड देना शुरू किया जाता है.

इसके बाद भी एक से दो साल तक के बच्चों के लिए ज़रूरी पोषक तत्वों में से एक तिहाई की भरपाई माँ के दूध से होती है.

कुछ लोगों का मानना है कि माँओं में ब्रेस्ट मिल्क स्तनों के आकार के हिसाब से कम और ज्यादा होता है. महिला रोग विशेषज्ञ अमृता हरी इससे इनकार करती हैं.

उनका कहना है कि स्तन के आकार का मांओं में दूध के निर्माण से कोई लेना देना नहीं है.

2024 में एक अगस्त से सात अगस्त तक मनाए जाने वाले विश्व स्तनपान सप्ताह का थीम 'अंतर को मिटाने -सबके लिए समर्थन' रखा गया है.

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इमेज कैप्शन, शिशु के जन्म के बाद से माताओं में तीन चरणों में दूध बनता है

स्तनपान के तीन स्टेज

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डॉक्टरों के मुताबिक, शिशु के जन्म के बाद से माताओं में तीन चरणों में दूध बनता है.

बच्चे के जन्म के दो से पाँच दिन तक कोलोस्टर्म का स्राव होता है.

जन्म के दूसरे और पांचवें दिन से दूसरे सप्ताह तक ट्रांजिशनल दूध का स्राव होता है

दूसरे या तीसरे सप्ताह से परिपक्व दूध का स्राव होता है.

कोलोस्टर्म और परिपक्व दूध में यही अंतर होता है कि नॉर्मल दूध के मुकाबले कोलोस्टर्म दूध का रंग पीला होता है.

इसमें कोलेस्टेरॉल, न्यूक्लियोसाइड्स और इमयूनोग्लोब्यूलिन जैसे कई एंटीबॉडीज होते हैं जो शिशुओं को किसी भी इन्फेक्शन से बचाकर रखती है.

माँ के दूध में 80 प्रतिशत पानी होता है जबकि सॉलिड फूड 12 फ़ीसदी होता है. इसमें कार्बोहाइड्रट और प्रोटीन भी दो-दो प्रतिशत होते हैं. इसके साथ ही एक निर्धारित मात्र में वो सभी जरूरी माइक्रो-न्यूट्रीएंट्स भी होते हैं जो शिशुओं को पाचन क्रिया में मदद करते हैं.

इसलिए नवजात शिशुओं को जन्म के पहले छह महीने तक सिर्फ माँ के दूध की ही ज़रूरत होती है. कोई दूसरा भोजन नहीं दिया जाता है.

स्त्री रोग विशेषज्ञ अमृता हरि कहती हैं कि भूख लगने पर उचित तरीके से स्तनपान कराया जाए तो शिशुओं को पानी देने की भी जरूरत नहीं पड़ती है.

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इमेज कैप्शन, शिशुओं के जन्म से छह महीने तक स्तनपान बेहद जरूरी होता है.

शिशुओं के लिए स्तनपान अवधि

जन्म से दो साल तक स्तनपान शिशुओं के लिए काफी स्वास्थवर्धक होता है.

कामकाजी महिलाएं, जो अकसर दूध को फ्रिज में रखती हैं और भूख लगने पर बच्चों को देती हैं, उन्हें इस मामले में सतर्क रहने की ज़रूरत है.

बच्चों को सीधे फ्रिज से निकालकर ठंडा दूध पिलाने की बजाय उन्हें दूध को सामान्य तापमान तक आने का इंतजार करना चाहिए और जब दूध नॉर्मल हो जाए, तभी बच्चों को दूध देना चाहिए.

हालांकि, दूध को स्टोर कर बाद में शिशुओं को पिलाना गलत नहीं है लेकिन इस प्रक्रिया में दूध में पोषक तत्वों के घटने की संभावना बनी रहती है.

ठंडा दूध शिशुओं के स्वास्थ्य के लिए हानिकारक भी होता है.

इसलिए माताओं के लिए बच्चों को प्राथमिकता देना महत्वपूर्ण हो जाता है, जब तक कि वो एक साल के ना हो जाएँ.

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दूध कम क्यों बनता है

तनाव के कारण कम दूध बनने की आशंका रहती है.

इसके अलावा कम स्तन ऊतकों यानी कोशिकाओं के समूह, असंतुलित हॉर्मोन्स और कम वजन के कारण भी मांओं में दूध कम बनता है.

हाइपो-थाईरॉइडीजम और हॉर्मोन्स की समस्या के कारण भी माताओं में कम दूध का स्राव होता है.

अगर माँ को पीलिया या फिर कोई दूसरा इन्फेक्शन हुआ हो तो डॉक्टर शिशुओं को दूध पिलाने की सलाह नहीं देते हैं.

हालांकि, ऐसे मामलों की संख्या सिर्फ एक प्रतिशत ही होती है.

स्तनपान के दौरान माँ और बच्चे के बीच एक प्रकार का बॉन्ड बन जाता है जिसे स्किन टू स्किन बॉन्डिंग भी कहते हैं. शिशुओं के विकास के लिए ये बॉन्डिंग काफी महत्वपूर्ण होती है.

इस अवधि में बच्चा माँ के साथ सुरक्षित महसूस करता है. शिशुओं के शारीरिक और मानसिक विकास में यह बॉन्ड बहुत हद तक मदद करता है.

स्त्री रोग विशेषज्ञ अमृता हरि बताती हैं कि स्तनपान करते वक्त माँ को कैसे शिशुओं को रखना चाहिए.

माताओं को स्तनपान हमेशा बैठकर ही कराना चाहिए.

शिशुओं को ठीक से पकड़ना चाहिए.

लेटकर या पड़े रहकर शिशुओं को स्तनपान नहीं कराना चाहिए. शिशुओं के लिए यह असुविधाजनक होता है.

स्तनपान के बाद शिशुओं को अपने कंधे पर रखकर डकार के लिए शिशुओं को उनके पीठ पर थपथपाना चाहिए.

एक माँ के लिए शिशु के जन्म के पहले छह महीने काफी महत्वपूर्ण होते हैं. अगर कोई बच्चा रात में नहीं सोता है तो यह माँ में भी सोने से संबंधित समस्याएं पैदा कर सकता है.

एक माँ के लिए अच्छी नींद एक मूलभूत जरूरत है. सोने संबंधी समस्याएं उनमें शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से प्रभावित करता है. खासकर अवसाद संबंधित समस्याएं पैदा करता है.

इसलिए इस अवधि में माताओं को पति और परिवार से सपोर्ट की ज्यादा ज़रूरत होती है.

इमेज कैप्शन, मां बनने के बाद रोजाना कम से कम तीस मिनट वॉकिंग जैसे सामान्य व्यायाम करना चाहिए.

इन बातों का रखें ध्यान

शिशुओं के स्तनपान अवधि में माताओं के लिए महत्वपूर्ण चीजें हैं, जिनका ध्यान रखना चाहिए.

  • रोजाना कम से कम 30 मिनट वॉकिंग जैसे सामान्य व्यायाम करें
  • जब भी आपके पास समय हो तो उस समय का इस्तेमाल आप सोने और आराम करने के लिए करें
  • शिशुओं के सोते वक्त माताओं को भी आराम करना चाहिए. इस समय उन्हें किसी और काम में उलझना नहीं चाहिए
  • अपना मन खुश रखें
  • अपनी पसंदीदा चीजें करें
  • दोनों स्तनों से शिशुओं को स्तनपान कराएं

स्त्री रोग विशेषज्ञ अमृता हरि के मुताबिक़, गर्भधारण के समय से लेकर स्तनपान कराने तक धूम्रपान ना करें और शराब ना पिएं. ऐसा करने से शिशुओं में पेट दर्द, छाती में इन्फेक्शन और श्वास संबंधी समस्याएं हो सकती हैं.

धूम्रपान अगर करती हैं तो दो घंटे बाद ही बच्चे को स्तनपान करवाएं. शराब पीने से दूध की मात्रा प्रभावित होती है. इस कारण शिशुओं में नींद और विकास से जुड़ी समस्याएं हो सकती हैं.

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स्तनपान करवाने वाली मांएं कैसा खाना खाएं

डाइटीशियन डॉ प्रतिभा बताती हैं कि माताओं को प्रोटीन और वसा को आपने डाइट में शामिल करना चाहिए.

वो बोलीं, “जब हम वसा की बात करते हैं तो ये पौधों से लेना चाहिए. इसलिए हम इसे वसा कहते हैं और जब हम इसे मांसाहारी खाने से लेते हैं तो उसे वसा नहीं कॉलेस्टेरॉल कहते हैं.”

स्तनपान करवाने वाली महिलाओं को उचित मात्रा में प्रोटीन दिन में तीन बार लेना चाहिए.

इसमें से 90 फ़ीसदी प्रोटीन पौधों से लेना चाहिए जबकि दस प्रतिशत ही मांसाहारी भोजन से लेना चाहिए.

एक संतुलित डायट भी जरूरी है. विटामिन और खनिज से भरपूर डायट को अपने भोजन का हिस्सा बनाना चाहिए. सब्जी, फल और दलों का भरपूर इस्तेमाल करना चाहिए. ये सभी न्यूनतम आवश्यक चीजें हैं.

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शिशुओं के लिए स्तनपान क्यों ज़रूरी है ?

डॉ प्रतिभा कहती हैं कि माँ का दूध शिशुओं को छह महीने तक पोषक तत्वों और एंटी-ऑक्सीडेंट्स की पूर्ति करता है.

वो कहती हैं, "माँ का दूध लॉन्ग, शॉर्ट-टर्म या किसी तरह के संक्रमण और समस्याओं से शिशुओं को बचाता है.”

माताओं में खाने को लेकर कई तरह के अंधविश्वास केवल ग्रामीण क्षेत्रों में ही नहीं, शहरी क्षेत्रों में भी प्रचलित हैं.

उदाहरण के लिए जैसे कहा जाता है कि सब्जियां या पालक शिशुओं में गैस की समस्या पैदा कर सकती है जो कि सही नहीं है.

माँ के दूध की क्वालिटी और मात्रा बढ़ाने के लिए वसा एक महत्वपूर्ण सामग्री है. इसलिए जरूरी है कि अपने खाद्य पदार्थों में माताओं को खाने में अच्छी खासी संख्या में वसा, प्रोटीन और तरल पदार्थ लेना चाहिए.

इन चीजों का पालन करने से निश्चित तौर पर माताओं के दूध की क्वालिटी में सुधार आता है.

मांओं के लिए क्या सबसे ज़रूरी

खाद्य पदार्थ, दवा या पाउडर के नियमित सेवन से भी ज़्यादा अहम है, मां की मानसिकता.

उचित मात्रा में मां में दूध बन सके, इसके लिए ये सबसे ज़रूरी है.

दूध बनाने की मात्रा में हॉर्मोन अहम होते हैं. हॉर्मोन सही रहें, इसके लिए मानसिकता का बेहतर होना बहुत ज़रूरी होता है.

महिलाओं को पोषक तत्वों वाले खाने का सेवन करना चाहिए.

डॉ प्रतिभा कहती हैं, “हमने अनुभव किया है कि बेहतर खाने का सेवन ना करने वाली महिलाएं भी अपने शिशुओं को उचित और ठीक से स्तनपान करा लेती हैं. माँ में दूध के निर्माण का आहार से कोई लेना देना नहीं है. हाँ, माँ के दूध की क्वालिटी और उनके आहार में एक प्रकार का संबंध है.”

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स्तनपान कराने वालीं माताओं में डर

महिला रोग विशेषज्ञ नित्या अपने अनुभव बताती हैं कि पहली बार बनी मांओं में किस प्रकार का डर और अंधविश्वास होता है.

वो बताती हैं- अपने बच्चे को स्तनपान कराने से एक माँ पूरे तौर पर परहेज कर रही थीं. उन्हें डर था कि अपने बच्चों को स्तनपान कराने से उनका स्तन शिथिल हो जाएगा. शुरुआत में तो महिला ने कम दूध के स्राव का बहाना बनाया लेकिन काउंसलिंग के बाद उसने बताया कि उन्होंने ऑनलाइन पढ़ा था और गलतफहमी के कारण स्तनपान कराने से परहेज कर रही थीं.

नित्या कहती हैं, “स्तनपान नहीं बल्कि उम्र और आनुवंशिकी ढीले स्तनों के लिए जिम्मेदार हैं. इसलिए उनके लिए बहुत ही लाभकारी है, अपने बच्चों को स्तनपान कराना.”

नित्या बोलीं, ''माँ के दूध का अत्यधिक रिसाव एक स्वाभाविक घटना है. इस पर किसी को शर्मिंदा नहीं होना चाहिए. हाँ, इसके कारण कपड़ों में दाग और दुर्गंध आ सकती है. इससे बचने के लिए माताएं एक्स्ट्रा अंडरवियर या नर्सिंग ब्रा का इस्तेमाल कर सकती हैं.''

हालांकि हर मां के शारीरिक या मानसिक स्वास्थ्य में अंतर हो सकता है. इसलिए अगर आपको मदद की जरूरत लगती है तो डॉक्टर से संपर्क ज़रूर करें.

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