क़तर ने कहा, 'ईरान ने सभी सीमाएं लांघ दीं', क्या खाड़ी देश भी इस जंग में कूद पड़ेंगे?
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- Author, बारबरा प्लेट-अशर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दोहा, क़तर
- पढ़ने का समय: 6 मिनट
इसराइल-अमेरिका और ईरान के बीच जारी युद्ध में खाड़ी देश भी बिना अपनी मर्ज़ी के फ़्रंटलाइन पर आ गए हैं. इसकी वजह से वे नाराज़ भी हैं.
दरअसल, अमेरिका-इसराइल के हवाई हमलों के जवाब में ईरान ने अपने अरब पड़ोसियों की ओर सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं.
ईरान का कहना है कि इन हमलों में अरब देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया गया. हालांकि, नागरिक और ऊर्जा ढांचे पर भी हमलों का असर पड़ा है.
ऐसा करके ईरान यात्रा, पर्यटन और फ़ाइनेंस के लिए सुरक्षित और समृद्ध माने जाने वाले खाड़ी की छवि को निशाना बना रहा है. साथ ही वह खाड़ी के तेल और गैस उद्योग को बाधित कर रहा है.
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यह एक ऐसा युद्ध है जिसे अरब सरकारें नहीं चाहती थीं और इसे रोकने की उन्होंने कोशिश की थी.
अब सवाल यह है कि क्या वे उन हमलों के कारण इस जंग की ओर खिंच जाएंगी, जिन्हें उन्होंने ईरान की "धोखेबाज़ी भरी" कार्रवाई बताया है.
क़तर के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता माजिद अल अंसारी ने मंगलवार को एक प्रेस ब्रीफ़िंग में कहा, "सभी सीमाएं पहले ही लांघी जा चुकी हैं."
उन्होंने पत्रकारों से कहा, "हमारी संप्रभुता पर लगातार हमले हो रहे हैं."
उन्होंने कहा, "इन्फ़्रास्ट्रक्चर पर हमले हो रहे हैं. हमारे रिहायशी इलाक़ों पर हमले हो रहे हैं. और इन हमलों के असर बहुत साफ़ हैं. जहां तक संभावित जवाबी कार्रवाई का सवाल है, हमारी लीडरशिप के पास सभी विकल्प हैं. हम यह बहुत स्पष्ट कहना चाहते हैं कि इस तरह के हमले बिना जवाब के नहीं रहेंगे और न ही रह सकते हैं."
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ईरान की क्या रणनीति है?
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खाड़ी देशों में अधिकतर ईरानी मिसाइलों को रोका जा रहा है, लेकिन कुछ हमलों में लोगों की मौतें भी हुई हैं.
ड्रोन एयर डिफ़ेंस को भेदने में अधिक सक्षम होते हैं और कम नुक़सान पहुंचाते हैं. फिर भी ये ऐसे हालात पैदा करते हैं जिससे व्यापार और यात्रा प्रभावित होती है.
ऐसा लगता है कि ईरान की यही रणनीति है. वह अपने अरब पड़ोसियों पर बड़ा दांव लगाना चाहता है ताकि वे युद्ध ख़त्म करने के लिए अमेरिका पर दबाव बढ़ाएं.
फ़ाइनेंशियल टाइम्स के मुताबिक़, ऐसा माना जा रहा है कि ईरान ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) पर लगभग उतने ही ड्रोन और मिसाइलें दागी हैं जितनी इसराइल पर. यूएई खाड़ी का प्रमुख व्यापार और पर्यटन केंद्र है.
क्षेत्र का अहम तेल और गैस उद्योग भी ईरान के निशाने पर आ सकता है. अगर इसमें बाधा आती है तो दुनियाभर की अर्थव्यवस्था पर गहरा असर पड़ सकता है.
ईरान की रणनीति उसी पर पड़ेगी भारी?
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इसका यह भी मतलब है कि ईरान की रणनीति उलटी भी पड़ सकती है. ईरान खाड़ी देशों को अमेरिका के और क़रीब धकेलने का जोखिम उठा रहा है और संभव है कि वे किसी भी रूप में जंग में शामिल हो जाएं.
अब तक इन देशों ने ईरान पर हमले के लिए अमेरिका को अपने हवाई क्षेत्र और ज़मीन का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी है.
उनका यह फ़ैसला बदल भी सकता है. किसी भी समय वे सैन्य अभियानों में हिस्सा लेने का फ़ैसला कर सकते हैं.
हालांकि, वे अभी उस स्थिति में नहीं हैं. फिलहाल अरब देश डिफ़ेंस पर ध्यान दे रहे हैं. लेकिन बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि यह युद्ध कितने समय तक चलता है.
इनमें से कुछ देश इस जंग में इसराइल का पक्ष लेते हुए नहीं दिखना चाहेंगे.
खाड़ी देशों की ईरान को हिदायत
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अक्तूबर 2023 में हमास के हमलों के जवाब में ग़ज़ा में इसराइल के घातक और विनाशकारी अभियान, साथ ही लेबनान और सीरिया जैसे देशों में उसकी सैन्य दखलअंदाज़ी ने अरब देशों के साथ संबंधों को और तनावपूर्ण बना दिया है.
पिछले साल जब इसराइल ने हमास लीडरशिप की हत्या की कोशिश में क़तर पर बमबारी की थी तो अरब देश बेहद नाराज़ हुए थे.
यह स्पष्ट है कि ईरान के हमलों ने खाड़ी देशों के बीच एकजुटता को मज़बूत किया है.
गल्फ़ कोऑपरेशन काउंसिल के छह सदस्य देशों सऊदी अरब, कुवैत, क़तर, बहरीन, संयुक्त अरब अमीरात और ओमान ने रविवार को आपात बैठक की.
इसमें उन्होंने एकजुटता दिखाई और "अपनी सुरक्षा और स्थिरता की रक्षा करने और अपने क्षेत्र, नागरिकों और निवासियों की सुरक्षा के लिए सभी ज़रूरी क़दम उठाने" की बात कही.
इन देशों ने 'आक्रामकता का जवाब देने के विकल्प' का भी ज़िक्र किया.
यूएई के राष्ट्रपति के एक वरिष्ठ कूटनीतिक सलाहकार अनवर गार्गश ने ईरान से समझदारी दिखाने की अपील की है.
उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट में लिखा, "आपका युद्ध आपके पड़ोसियों के साथ नहीं है. अपने आसपास के क्षेत्र को देखिए और अलगाव और तनाव का दायरा बढ़ने से पहले अपने पड़ोसियों के साथ समझदारी और ज़िम्मेदारी से पेश आइए."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.
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